घूँट सुधा रो पीवण खातिर
हंसलो दर-दर भटके रे ।
दळ कुरजां रो जळ रे खातिर
रण, जंगल में भटके रे ।
इण घर कलरव काळजिए री
उण घर अखियाँ तरसे रे ।
घूंमकडा रा टाबरिया पण
बूँद- बूँद ने तरसे रे ।
रूँख खेत रा सूखण लाग्या
बादळीया नीं बरसे रे ।
रण रा खेत बूँद ने तरसे
हिमाळे जल बरसे रे ।। ।।
लेखक :- बाबुलाल राईका सरनाऊ
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें