सोमवार, 13 जुलाई 2015

अखियाँ तरसे

घूँट सुधा रो पीवण खातिर
हंसलो दर-दर भटके रे  ।

दळ कुरजां रो जळ रे खातिर
रण, जंगल में भटके रे ।

इण घर कलरव काळजिए री
उण घर अखियाँ तरसे रे ।

घूंमकडा रा टाबरिया पण
बूँद- बूँद  ने तरसे रे ।

रूँख खेत रा सूखण लाग्या
बादळीया नीं बरसे रे ।

रण रा खेत बूँद ने तरसे
हिमाळे जल बरसे रे ।। ।।

लेखक :- बाबुलाल राईका सरनाऊ

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