दौड़ भाग के जीवन में
जनम मरण का भेद न जानें
तोड़ें केवल रोटी
हां हम जंगल के जोगी ।।
उजली कंचन काया में और
लोभ लालच की माया में हम
बन गए हैं भोगी
हां हम जंगल के जोगी ।।
पुरखों की हम शान न जानें
मर्यादा और मान न जानें
करते बातें मोटी मोटी
हां हम जंगल के जोगी ।।
खानें का कोई भान नहीं
न पीने की लाज हैं
फिरते बनके रोगी
हां हम जंगल के जोगी।।
लेखक :- बाबुलाल राईका सरनाऊ
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