शांती की जिँदगी, सुकून के वो पल।
वो खेत की मेङ, बैलो के वो हल।
बीत गए सारे, जमाने के वो पल॥
वो ओँस की बूदेँ, वो सरसो के वो फूल।
वो बिन मतलब की बातेँ, झगङे वो बेतूल।
वो माटी थी सोना, अब तो बची हैँ धूल॥
वो सागर की लहरेँ, वो नहरेँ वो झील।
वो मानव की शक्ति, वो काम बङे बोझील।
वो जमाना चला गया, अब बन गया मन क्रोधील।॥
वो पनघट वो बावङी, वो नदियोँ के तीर।
वो राजा की शानोँ-शौकत, वो राणा के वीर।
वो मानव भी हैँ कहाँ, जो जाने पराई पीर॥:॥
वो खेत की मेङ, बैलो के वो हल।
बीत गए सारे, जमाने के वो पल॥
वो ओँस की बूदेँ, वो सरसो के वो फूल।
वो बिन मतलब की बातेँ, झगङे वो बेतूल।
वो माटी थी सोना, अब तो बची हैँ धूल॥
वो सागर की लहरेँ, वो नहरेँ वो झील।
वो मानव की शक्ति, वो काम बङे बोझील।
वो जमाना चला गया, अब बन गया मन क्रोधील।॥
वो पनघट वो बावङी, वो नदियोँ के तीर।
वो राजा की शानोँ-शौकत, वो राणा के वीर।
वो मानव भी हैँ कहाँ, जो जाने पराई पीर॥:॥