हम सिकंदर आज के
राही हैँ सरताज के
न सार हैँ न हार हैँ
फिर भी दिल मे अरमान हैँ।
अरमानोँ के पंख नहीँ हैँ
आस दब गई तलवोँ मेँ
फिर भी साज बने सरताज के,
हम हैँ सिँकदर आज के॥
उल्लासी मेँ नाच रहे थे
यारी की थी बेसुमारी
न राह मिली विकास की
न यार मिले कोई काज के,
हम हैँ सिकंदर आज के॥
अंदेशे की आङ में हम
खा रहे दर दर की ठोकर
ठोकर ने फिर से गिराया
रहे हम न कोई काज के,
हम हैँ सिकंदर आज के॥!॥
राही हैँ सरताज के
न सार हैँ न हार हैँ
फिर भी दिल मे अरमान हैँ।
अरमानोँ के पंख नहीँ हैँ
आस दब गई तलवोँ मेँ
फिर भी साज बने सरताज के,
हम हैँ सिँकदर आज के॥
उल्लासी मेँ नाच रहे थे
यारी की थी बेसुमारी
न राह मिली विकास की
न यार मिले कोई काज के,
हम हैँ सिकंदर आज के॥
अंदेशे की आङ में हम
खा रहे दर दर की ठोकर
ठोकर ने फिर से गिराया
रहे हम न कोई काज के,
हम हैँ सिकंदर आज के॥!॥
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