शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

स्वप्न


वो काली घनघोर निशा थी,
मै तो पथ पर जा रहा था,
चीख रहे थे चील गीदङ,
बोल रहा था उल्लू बैठा,
पेङ की चोटी पे जाने।
बात थी डरने की यारो,
न चांद की चांदनी थी
न तारोँ का नूर था।
मैँ चला थोङी दूरी पर,
चिखा एक सूअर जाने क्योँ,
राग उसका बेसूर था।
घनघोर घटा भी छा रही थी
बदन भी कंपकंपा रहा था
फिर अचानक देखी बिल्ली,
झपट पङी वो ओर मेरे,
निँद टूटी फिर अचानक ,
होश आया फिर से शायद 
स्वप्न था नरक का॥:॥                                                                                                                                                                                         

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