शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

स्वप्न


वो काली घनघोर निशा थी,
मै तो पथ पर जा रहा था,
चीख रहे थे चील गीदङ,
बोल रहा था उल्लू बैठा,
पेङ की चोटी पे जाने।
बात थी डरने की यारो,
न चांद की चांदनी थी
न तारोँ का नूर था।
मैँ चला थोङी दूरी पर,
चिखा एक सूअर जाने क्योँ,
राग उसका बेसूर था।
घनघोर घटा भी छा रही थी
बदन भी कंपकंपा रहा था
फिर अचानक देखी बिल्ली,
झपट पङी वो ओर मेरे,
निँद टूटी फिर अचानक ,
होश आया फिर से शायद 
स्वप्न था नरक का॥:॥                                                                                                                                                                                         

रविवार, 25 मार्च 2012

वो पल

शांती की जिँदगी, सुकून के वो पल।
वो खेत की मेङ, बैलो के वो हल।
बीत गए सारे, जमाने के वो पल॥
वो ओँस की बूदेँ, वो सरसो के वो फूल।
वो बिन मतलब की बातेँ, झगङे वो बेतूल।
वो माटी थी सोना, अब तो बची हैँ धूल॥
वो सागर की लहरेँ, वो नहरेँ वो झील।
वो मानव की शक्ति, वो काम बङे बोझील।
वो जमाना चला गया, अब बन गया मन क्रोधील।॥
वो पनघट वो बावङी, वो नदियोँ के तीर।
वो राजा की शानोँ-शौकत, वो राणा के वीर।
वो मानव भी हैँ कहाँ, जो जाने पराई पीर॥:॥

सिकंदर

हम सिकंदर आज के
राही हैँ सरताज के
न सार हैँ न हार हैँ
फिर भी दिल मे अरमान हैँ।
अरमानोँ के पंख नहीँ हैँ
आस दब गई तलवोँ मेँ
फिर भी साज बने सरताज के,
हम हैँ सिँकदर आज के॥
उल्लासी मेँ नाच रहे थे
यारी की थी बेसुमारी
न राह मिली विकास की
न यार मिले कोई काज के,
हम हैँ सिकंदर आज के॥
अंदेशे की आङ में हम
खा रहे दर दर की ठोकर
ठोकर ने फिर से गिराया
रहे हम न कोई काज के,
हम हैँ सिकंदर आज के॥!॥

अपनत्व

एक प्रयास है कि कुछ अच्छा हो जाए, पर अपनों की अनदेखी से मजबूर हूँ। पल-पल समर्पण चाहता हूँ, पर पास होते हुए क्यो दूर हूँ?😇 पैर ...